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अमेरिका के शहर में जब शीरे की बाढ़ ने मचाई थी तबाही, 21 लोगों की गई थी जान, 150 हुए थे घायल

15 जनवरी 1919 को अमेरिका के बोस्टन में एक विशाल टैंक फटने से शीरे की विनाशकारी बाढ़ आ गई थी। ‘ग्रेट मोलासेस फ्लड’ नाम से जाने गए इस हादसे में 21 लोगों की मौत हो गई थी और 150 से अधिक घायल हुए थे।

Written By: Vineet Kumar Singh @VickyOnX
Published : Jan 15, 2026 08:50 am IST, Updated : Jan 15, 2026 08:50 am IST
'ग्रेट मोलासेस फ्लड' के...- India TV Hindi
Image Source : PUBLIC DOMAIN 'ग्रेट मोलासेस फ्लड' के बाद तबाही की ये तस्वीर सामने आई थी।

Great Molasses Flood | अमेरिका के बोस्टन शहर में 15 जनवरी 1919 को दोपहर के करीब 12:30 बजे एक ऐसा अजीबोगरीब हादसा हुआ था, जिसकी दूसरी मिसाल ढूंढ़ने से भी नहीं मिलती। बोस्टन के नॉर्थ एंड इलाके में हुए इस हादसे को इतिहास 'ग्रेट मोलासेस फ्लड' (Great Molasses Flood) या 'बोस्टन मोलासेस डिजास्टर' (Boston Molasses Disaster) के नाम से जानता है। इस इलाके में एक विशाल टैंक फट गया था जिसमें 23 लाख गैलन शीरा (गुड़ की तरह चिपचिपा पदार्थ) भरा था। टैंक के फटने के बाद शीरे की लहर इतनी तेज और घातक थी कि इसने 21 लोगों की जान चली गई और 150 से ज्यादा लोग घायल हो गए। आइए, आपको इस घटना के बारे में विस्तार से बताते हैं।

कैसे हुई थी इस भयावह घटना की शुरुआत?

15 जनवरी 1919 को जो टैंक फटा था, उसे 1915 में ही बनाया गया था। यह टैंक प्योरिटी डिस्टिलिंग कंपनी का था, जो बाद में यूनाइटेड स्टेट्स इंडस्ट्रियल अल्कोहल (USIA) कंपनी का हिस्सा बन गई। टैंक को बोस्टन के बंदरगाह के पास स्थित एक व्यस्त इलाके कमर्शियल स्ट्रीट पर स्थापित किया गया था। यह विशालकाय टैंक करीब 50 फीट ऊंचा और 90 फीट चौड़ा था, जिसमें 23 लाख गैलन गुड़ रखा जा सकता था। गुड़ का इस्तेमाल अल्कोहल बनाने में होता था, जो पहले विश्व युद्ध के दौरान हथियारों के लिए जरूरी था। जंग के खात्मे के बाद के बाद, अमेरिका में शराबबंदी का कानून लागू होने वाला था, इसलिए कंपनी जल्दी-जल्दी गुड़ का स्टॉक कर रही थी।

Great Molasses Flood, Boston Molasses Disaster, 1919 Boston disaster

Image Source : PUBLIC DOMAIN
शीरे की इस बाढ़ ने रेलवे लाइन को भी काफी नुकसान पहुंचाया था।

यह टैंक बड़ा जरूर था, लेकिन इसमें शुरू से ही कई समस्याएं थीं। इसके निर्माण में इस्तेमाल हुईं स्टील की चादरें जरूरत से आधी मोटी थीं। इसमें मैंगनीज नहीं था, जिससे यह कमजोर हो गया था, और इसमें दरारें पड़ गई थीं। इस टैंक का निर्माण किसी इंजीनियरिंग एक्सपर्ट की देखरेख के बगैर ही कर दिया गया था। कंपनी के खजांची आर्थर जेल ने बिना कोई परीक्षण किए ही टैंक का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। टैंक में पानी भरकर लीकेज चेक करने जैसी छोटी बात का भी ध्यान नहीं दिया गया। इस टैंक से आमतौर पर इतना गुड़ लीक हो जाता था कि आसपास के लोग इसे इकट्ठा करके घर ले जाते थे। कंपनी ने लीकेज को छिपाने के लिए टैंक को भूरे रंग से पेंट कर दिया।

बोस्टन के उस इलाके में उस दिन क्या हुआ था?

1919 में जनवरी की शुरुआत में बोस्टन में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, लेकिन 15 जनवरी को तापमान अचानक बढ़ गया। बोस्टन के कुछ इलाकों में तापमान में 2 डिग्री फारेनहाइट से 41 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ोतरी हुई थी।  2 दिन पहले एक जहाज से गर्म गुड़ टैंक में डाला गया था। टैंक में पड़ा पुराना गुड़ ठंडा था, और नया गर्म, जिससे इसमें दबाव बढ़ गया। गुड़ में फर्मेंटेशन की वजह से कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनी, जो दबाव को और बढ़ा रही थी। दबाव आखिरकार इतना बढ़ा कि दोपहर में टैंक का मैनहोल कवर फट गया।

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हादसे से पहले टैंक कुछ ऐसा नजर आता था।

टैंक के अचानक फटने से शीरे या गुड़ की 25 फीट ऊंची लहर बह निकली और करीब 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से सड़कों पर फैलने लगी। शीरे की इस लहर ने कई ब्लॉक्स को तबाह कर दिया। तमाम इमारतें ढह गईं, कई कारें चपेट में आ गईं और तमाम घोड़े फंस गए। शीरे का दवाब इतना तेज था कि बोस्टन एलिवेटेड रेलवे की पटरी टूट गई, और एक ट्रेन भी पटरी से उतर गई। पूरे बंदरगाह का पानी भूरा हो गया। टैंक से निकला शीरा या गुड़ चिपचिपा था, जिसमें कई लोग और जानवर फंस गए। ठंडी हवा से गुड़ जल्दी गाढ़ा हो गया, जिससे बचना मुश्किल हो गया।

हादसे में लोगों की मौत के कारण क्या थे?

बोस्टन में हुए इस हादसे में कुल मिलाकर 21 लोग मारे गए, जिनमें मजदूर, ड्राइवर, बच्चे, गृहिणी और फायरफाइटर शामिल थे। घटना में कई लोगों की मौत भगदड़ में कुचले जाने से हुई, कुछ लोग शीरे की बाढ़ में डूब गए और तमाम लोग घुटन की वजह से मर गए। इस भयावह घटना में करीब 150 लोग घायल हुए थे जिनमें से कइयों को चोट लगी थी, कई लोग गर्म शीरे से जल गए थे और कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। चिपचिपे शीरे में फंसने की वजह से कई घोड़ों ने भी तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया था। हादसा इतना भयावह था कि कुछ लाशें महीनों बाद मिलीं।

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लाल घेरे में 'ग्रेट मोलासेस फ्लड' से प्रभावित बोस्टन का इलाका।

हादसे के बाद बचाव कार्य तुरंत शुरू हो गया था। पुलिस, रेड क्रॉस, सेना और नौसेना के लोग मौके पर पहुंच गए थे और लोगों को रेस्क्यू करना शुरू कर दिया था। USS नैंटिकेट के 116 कैडेट्स ने घुटनों तक गुड़ में उतरकर लोगों को निकाला। लोगों के इलाज के लिए मौके पर तुरंत एक अस्थायी अस्पताल बनाया गया। लेकिन शीरे के गाढ़ा होने से बचाव कार्य में काफी मुश्किलें आईं और इलाके की सफाई में हफ्तों लग गए। फायरबोट के जरिए समुद्री पानी से शीरे को धोया गया। बोस्टन के कई इलाके गुड़ की वजह से चिपचिपे हो गए और कई सालों तक गर्मियों के दौरान वहां गुड़ या शीरे की महक आती रही। 

इस हादसे के बाद क्या-क्या बदल गया?

टैंक फटने से हुए इस हादसे ने अमेरिका और बाकी दुनिया में काफी कुछ बदल दिया। पीड़ितों ने हादसे के बाद USIA के खिलाफ मुकदमा किया। यह मैसाचुसेट्स का पहला क्लास-एक्शन सूट था। कंपनी ने आरोप लगाया कि इटालियन एनार्किस्ट्स ने बम फोड़ा था जिससे यह हादसा हुआ, लेकिन अदालत ने कंपनी को दोषी ठहराया। इस मामले की सुनवाई 3 साल तक चली और करीब 3 हजार गवाहों ने अपनी गवाही दी। कंपनी ने उस जमाने में 6 लाख 28 हजार डॉलर मुआवजा दिया जो कि काफी बड़ी रकम थी। इस हादसे में हुई हर मौत पर करीब 7000 डॉलर का मुआवजा दिया गया।

इस हादसे के बाद अमेरिका में इंजीनियरिंग सुरक्षा के नियम बदल गए। अब अमेरिका में हर बड़े निर्माण में लाइसेंसी इंजीनियरों का होना अनिवार्य है। जहां यह भयावह हादसा हुआ था, वहां अब लैंगोन पार्क स्थित है, जहां बेसबॉल ग्राउंड और खेल के मैदान हैं। हादसे की जगह पर घटना के बारे में याद दिलाती हुई एक पट्टिका लगाई गई है। 2019 में इस हादसे के 100 साल पूरे होने पर एक समारोह हुआ, जहां पीड़ितों को याद किया गया। दुनिया के इतिहास में हुए इस अभूतपूर्व हादसे ने सीख दी कि छोटी से छोटी लापरवाही भी कितनी भारी पड़ सकती है, अब लोगों ने इससे कितना सीखा, यह देखने वाली बात है।

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