Friday, February 06, 2026
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Explainer: किसी क्राइम थ्रिलर से कम नहीं रहा है नेपाल का इतिहास, जानें कैसे हुआ था 240 साल पुरानी राजशाही का अंत

नेपाल में राजशाही को वापस बहाल करने की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन जारी है। प्रदर्शनकारी पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के समर्थन में लगातार रैलियां निकाल रहे हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि क्या है ये पूरा मुद्दा।

Edited By: Subhash Kumar @ImSubhashojha
Published : Apr 01, 2025 02:57 pm IST, Updated : Apr 01, 2025 03:50 pm IST
नेपाल में राजशाही को बहाल करने की मांग।- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV नेपाल में राजशाही को बहाल करने की मांग।

भारत के पड़ोसी देश नेपाल में राजशाही को बहाल करने की मांग को लेकर भारी बवाल मचा हुआ है। बीते दिनों काठमांडू में सुरक्षाकर्मियों और राजशाही समर्थक कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हुई जिसके बाद कई इलाकों में कर्फ्यू लगाया गया था। तिनकुने में हुई झड़प में दो लोगों की मौत हो गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए। इस मामले में 100 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। इस घटना के बाद से ही नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और नेपाल के पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह आमने-सामने हैं। लेकिन नेपाल के लोग राजशाही को वापस लाने की मांग क्यों कर रहे हैं? नेपाल में राजशाही कब तक थी और इसे कब और क्यों खत्म किया गया? आइए जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब हमारी इस खबर में।

नेपाल में कब तक रही राजशाही?

नेपाल में करीब 240 साल तक राजशाही रही थी। दरअसल, साल 1768 में गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह ने कई रजवाड़ों को एक साथ लाकर नेपाल की नींव रखी थी। इसके बाद उन्होंने भदगांव, काठमांडू और पाटन पर जीत हासिल की और नेपाल का एकीकरण किया। नेपाल की पहचान एक हिंदू राष्ट्र के तौर पर थी। हालांकि, साल 2008 में नेपाल के राजनीतिक दलों ने संसद की घोषणा के माध्यम से राजशाही को खत्म कर दिया था। इसके बाद नेपाल को हिंदू राष्ट्र के बजाय एक धर्मनिरपेक्ष, संघीय, लोकतांत्रिक गणराज्य में बदल दिया गया था।

क्यों हुआ राजशाही का अंत?

दरअसल, नेपाल में लोकतंत्र के लिए पहला आंदोलन 1950 के दशक में हुआ। इसके बाद देश में मया संविधान बनाकर चुनाव भी हुए। हालांकि, इसके कुछ ही समय बाद नेपाल के तत्कालीन राजा महेंद्र ने संसद को भंग कर के लोकतांत्रिक सरकार को हटा दिया। इसके बाद 1990 के दशक में नेपाल में लोकतंत्र के लिए एक और आंदोलन हुआ। तब तत्कालीन राजा बीरेंद्र ने संविधान में सुधारों को स्वीकार कर लिया। इसके बाद एक बहुदलीय संसद की स्थापना हुई। हालांकि, राष्ट्र के प्रमुख राजा ही बने रहे। बस उनकी शक्तियां थोड़ी सीमित हो गईं। इन सब के बीच (1996-2006) नेपाल में माओवादी विद्रोह भी जारी था जिसका नेतृत्व पुष्प कमल दहल प्रचंड कर रहे थे।

राजमहल हत्याकांड के बाद बड़ा बदलाव

नेपाल में साल 2001 में 1 जून की तारीख को इतिहास की सबसे खौफनाक घटना घटी। नेपाल के क्राउन प्रिंस दीपेंद्र ने पारिवारिक कलह में राजमहल में पूरे शाही परिवार की हत्या कर दी। नेपाल के राजा बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या समेत राजपरिवार के 09 लोगों की हत्या कर दी गई। इस घटना में राजा के भाई ज्ञानेंद्र और उनका परिवार ही बच पाया। इस घटना के बाद ज्ञानेंद्र नेपाल की गद्दी पर बैठे और देश की निर्वाचित सरकार के साथ रहे। हालांकि, उन्होंने कुछ ही समय बाद 2005 में संसद को बर्खास्त कर दिया और पूरी ताकत अपने हाथों में ले ली। ऐसे में साल 2006 में लोकतांत्रिक पार्टियों ने एक और जन आंदोलन शुरू किया। नेपाल में करीब कई दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा। इसके बाद राजा ज्ञानेंद्र झुक गए और संसद को बहाल कर दिया। इसके बाद साल 2008 में एक शांति समझौता हुआ और नेपाल में 240 साल पुरानी राजशाही का अंत हो गया।

नेपाल की राजशाही का इतिहास।

Image Source : INDIA TV
नेपाल की राजशाही का इतिहास।

अब क्यों हो रही है राजशाही की मांग?

नेपाल के पूर्व पूर्व नरेश ज्ञानेन्द्र शाह ने फरवरी में लोकतंत्र दिवस पर कहा था कि अब समय आ गया है जब हमें देश की सुरक्षा और एकता के लिए जिम्मेदारी लेनी चाहिए। इसके बाद से ही राजतंत्र के समर्थक पूरे देश में सक्रिय हो गए हैं। पूर्व राजा के समर्थक गत कई दिनों से काठमांडू और पोखरा सहित देश के विभिन्न हिस्सों में रैलियां निकाल रहे हैं और राजशाही को पुनः बहाल करने की मांग कर रहे हैं। दरअसल, नेपाल में राजशाही की मांग करने वालों ने देश के राजनीतिक दलों पर भ्रष्टाचार में डूबने का आरोप लगाया है। इसके अलावा इन पर दूसरे धर्मों को बढ़ावा देने के भी आरोप लग रहे हैं। देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ी हुई है और बेरोजगारी भी बढ़ रही है। राजशाही के खत्म होने के बाद नेपाल में कभी राजनीतिक तौर पर स्थिरता नहीं रही। देश में 16 सालों में 13 सरकारें बनी हैं।

नेपाल के PM समेत अन्य नेता क्या बोले?

नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली ने राजशाही समर्थक समूहों पर कटाक्ष करते हुए रविवार को कहा कि लोकतंत्र एक ‘राजमार्ग’ की तरह है, जिसमें कोई ‘रिवर्स गियर’ नहीं होता। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने रविवार को कहा कि पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह संवैधानिक राजा बनने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। वहीं, सीपीएन-माओवादी सेंटर’ के प्रमुख पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ ने शुक्रवार को कहा कि राजशाही समर्थक ताकतों को नेपाली जनता और राजनीतिक दलों के उदारवादी रुख को उनकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए। हालांकि, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी राजा ज्ञानेंद्र के समर्थन में है और देश में हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग कर रही है।

ज्ञानेंद्र की गतिविधियों पर भी सतर्कता बढ़ाई गई

नेपाल की सरकार लगातार ज्ञानेंद्र शाह पर हमलावर है। सूत्रों ने जानकारी दी है कि सरकार ने पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र  की गतिविधियों पर भी सतर्कता बढ़ा दी है। नेपाल सरकार ने पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह के लिए तैनात सुरक्षाकर्मियों की संख्या घटा दी है। नुकसान के हर्जाने के रूप में 7,93,000 नेपाली रुपये का भुगतान करने को कहा गया।

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