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किसानों के घर लौटते ही गरीबों को सताने लगी है रहने और खाने की चिंता

 Edited By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Dec 11, 2021 08:58 pm IST,  Updated : Dec 11, 2021 08:58 pm IST

कुंडली की झुग्गियों में रहने वाले 13 वर्षीय आर्यन ने बताया, हम अपना नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना यहीं लंगर में करते थे।

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दिल्ली-हरियाणा के सिंघू सीमा पर हजारों किसानों ने अपना विरोध प्रदर्शन समाप्त कर दिया और लंगर बंद कर दिया। Image Source : PTI

Highlights

  • 13 वर्षीय आर्यन को अब अपने 2 जून की रोटी की चिंता सता रही है।
  • कई लोग किसानों द्वारा स्थापित सामुदायिक रसोई में भोजन करते थे।
  • बड़ी संख्या में बच्चों और स्थानीय गरीबों ने लंगर पर आखिरी बार नाश्ता किया।

नयी दिल्ली: दिल्ली-हरियाणा के सिंघू सीमा पर हजारों किसानों ने अपना विरोध प्रदर्शन समाप्त कर दिया और लंगर बंद कर दिया, जिसके बाद से 13 वर्षीय आर्यन को अब अपने 2 जून की रोटी की चिंता सता रही है। आर्यन कोई अकेला नहीं, बल्कि उसकी तरह कई लोग हैं, जो किसानों द्वारा स्थापित सामुदायिक रसोई में भोजन करते थे और एक साल से अधिक के विरोध प्रदर्शन के दौरान उनके द्वारा लगाए गए तंबुओं में सोते थे। शनिवार की सुबह झुग्गीवासियों सहित बड़ी संख्या में बच्चों और स्थानीय गरीबों ने किसानों के लंगर पर आखिरी बार नाश्ता किया।

‘आज लंगर में यह हमारा आखिरी नाश्ता है’

कुंडली की झुग्गियों में रहने वाले 13 वर्षीय आर्यन ने बताया, ‘हम अपना नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना यहीं लंगर में करते थे। आज लंगर में यह हमारा आखिरी नाश्ता है। अब, हमें या तो खुद खाना बनाना होगा या अन्य विकल्पों की तलाश करनी होगी।’ किसानों ने कहा कि उनके मन में भी ऐसे स्थानीय बच्चों के लिए भावनाएं पैदा हो गई थीं, जो विरोध स्थल पर आते थे और उन्हें अपने ही बेटों और पोते की याद दिलाते थे।

‘उन्होंने मुझे मेरे पोतों की याद दिला दी थी’
मोहाली के सतवंत सिंह ने कहा, ‘ये बच्चे हमारे विरोध-प्रदर्शन का हिस्सा बन गए थे, क्योंकि वे यहां भोजन के लिए आया करते थे। उन्होंने मुझे मेरे पोतों की याद दिला दी थी। उन्हें यहां रखना अच्छा लगता था। अब ईश्वर उनकी रक्षा करेंगे।’ मलिन बस्तियों के निवासी आमतौर पर इस क्षेत्र में कारखानों या गोदामों में काम करते हैं। किसानों द्वारा बनाए गए अस्थायी टेंटों में रहने वाले बेघर लोगों को अपने रहने की व्यवस्था को लेकर चिंता सता रही थी।

‘मैं फिर से फुटपाथ पर आ जाऊंगा’
बिहार के सुपौल के 38 वर्षीय मोनू कुशवाहा ने कहा कि किसानों के विरोध-प्रदर्शन के लिए सिंघू सीमा पर आने से पहले, वह फुटपाथ पर सोता थे, लेकिन पिछले साल आंदोलन शुरू होने के बाद हालात बदल गये थे। कुशवाहा ने अफसोस जताते हुए कहा, ‘किसानों के आंदोलन के दौरान, मैं उनके एक तंबू में सोता था और लंगर में खाना खाता था। अब यह सब बंद हो जाएगा और मैं फिर से फुटपाथ पर आ जाऊंगा।’

‘हम लंगर में बहुत सारा खाना खाते थे’
कुंडली में केएफसी टॉवर के पास स्थित झुग्गियों में रहने वाले आठ वर्षीय मौसम ने कहा कि वह पिछले एक साल से लंगर में अच्छा खाना खा रहा था। उसने कहा, ‘मेरे पिता एक कारखाने में काम करते हैं लेकिन चूंकि परिवार बड़ा है, इसलिए हमें अक्सर एक समय का भोजन छोड़ना पड़ता है। लेकिन पिछले एक साल से, हम लंगर में बहुत सारा खाना खाते थे। हम घर के लिए भी पैक करवाकर ले जाते थे। यह सब अब बंद हो जाएगा।’’

‘दुख की बात है कि किसान वापस जा रहे हैं’
11 वर्षीय तरुण ने कहा, ‘मेरा स्कूल राजमार्ग के दूसरी ओर स्थित है। जब से किसान यहाँ आए थे, मुझे यातायात नहीं होने के कारण सड़क पार करने में कोई समस्या नहीं होती थी। मैं यहां खाना खाता था और फिर स्कूल चला जाता था। यह मेरे लिए दुख की बात है कि किसान वापस जा रहे हैं।’ तरुण के पिता एक शोरूम में काम करते हैं। (भाषा)

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