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Karnataka Controversy: 'हम कुरान के व्याख्याकार नहीं हैं', सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान की बड़ी टिप्पणी

 Written By: Sailesh Chandra
 Published : Sep 15, 2022 11:01 pm IST,  Updated : Sep 22, 2022 07:10 pm IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वह पवित्र कुरान का 'व्याख्याकार' नहीं है और कर्नाटक हिजाब प्रतिबंध मामले में उसके सामने यह दलील दी गई है कि कोर्टें धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने के लिए सक्षम नहीं हैं।

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Supreme Court Image Source : FILE PHOTO

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वह पवित्र कुरान का 'व्याख्याकार' नहीं है और कर्नाटक हिजाब प्रतिबंध मामले में उसके सामने यह दलील दी गई है कि कोर्टें धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने के लिए सक्षम नहीं हैं। शीर्ष कोर्ट कर्नाटक के शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध हटाने से इनकार करने वाले कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दलीलें सुन रही थी। उसने यह टिप्पणी तब की जब एक याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि जिस निर्णय को चुनौती दी गई है, वह इस्लामी और धार्मिक दृष्टिकोण से संबंधित है। जज हेमंत गुप्ता और जज सुधांशु धूलिया की एक पीठ ने कहा, ''एक तरीका कुरान की व्याख्या करने का है। हम कुरान के व्याख्याकार नहीं हैं। हम यह नहीं कर सकते और यही दलील भी दी गई है कि कोर्टें धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने के लिए सक्षम नहीं हैं।''

शीर्ष कोर्ट ने कई वकीलों की दलीलें सुनीं, जो याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए और विभिन्न पहलुओं पर जिरह की, जिसमें यह भी शामिल है कि हिजाब पहनना निजता, गरिमा और इच्छा का मामला है और क्या इसे पहनने की प्रथा आवश्यक है या नहीं। अधिवक्ताओं में से एक ने दलील दी कि जिस तरह से हाई कोर्ट ने इस्लामी और धार्मिक परिप्रेक्ष्य में मामले की व्याख्या की, वह ‘‘गलत आकलन’’ था। पीठ ने कहा, ‘‘हाई कोर्ट ने भले ही कुछ भी कहा हो, लेकिन अब हम अपीलों पर स्वतंत्र विचार कर रहे हैं।’’

'हिजाब निजता और इच्छा का मामला है'

अधिवक्ता शोएब आलम ने दलील दी कि हिजाब पहनना किसी की गरिमा, निजता और इच्छा का मामला है। उन्होंने कहा, ‘‘एक तरफ मेरा शिक्षा का अधिकार, स्कूल जाने का अधिकार, दूसरों के साथ समावेशी शिक्षा पाने का अधिकार है। दूसरी तरफ मेरा दूसरा अधिकार है, जो निजता, गरिमा और इच्छा का अधिकार है।’’ आलम ने कहा कि सरकारी आदेश (जीओ) द्वारा शिक्षण संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध का प्रभाव यह है कि ‘‘मैं तुम्हें शिक्षा दूंगा, तुम मुझे निजता का अधिकार दो, इसे समर्पित करो। क्या राज्य ऐसा कर सकता है? जवाब ‘नहीं’ है।’’

उन्होंने कहा कि राज्य एक सरकारी आदेश जारी करके यह नहीं कह सकता कि कोई व्यक्ति स्कूल के दरवाजे पर निजता के अधिकार को समर्पित कर दे। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुझाव दिया कि मामले को संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘हिजाब पहनना इस बात की अभिव्यक्ति है कि आप क्या हैं, आप कौन हैं, आप कहां से हैं।

हिजाब व्यक्तित्व और सांस्कृतिक परंपरा का भी एक हिस्सा है

सिब्बल ने कहा कि सवाल यह है कि जब महिला को सार्वजनिक स्थान पर हिजाब पहनने का अधिकार है तो क्या स्कूल में प्रवेश करने पर उसका अधिकार समाप्त हो जाता है। उन्होंने कहा,‘‘आप मुझे खत्म नहीं कर सकते।’’ उन्होंने दलील दी कि हिजाब अब व्यक्तित्व और सांस्कृतिक परंपरा का भी एक हिस्सा है। वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि हिजाब पहनने की प्रथा धर्म का आवश्यक हिस्सा है या नहीं। उन्होंने दलील दी कि एक बार प्रथा स्थापित हो जाने के बाद, यह संविधान के अनुच्छेद 25 के दायरे में आ जाती है। गोंजाल्विस ने दलील दी कि हाई कोर्ट का फैसला एक ऐसा फैसला है जहां धारणा ‘‘बहुसंख्यक समुदाय’’ की है, जहां अल्पसंख्यक दृष्टिकोण को "बहुत आंशिक रूप से और बहुत गलत तरीके से" देखा जाता है।

यदि आप पगड़ी पहनते हैं, तो आप हिजाब क्यों नहीं पहन सकते?

गोंसाल्विस ने सवाल किया, ‘‘क्या अंतर है? यदि आप पगड़ी पहनते हैं, तो आप हिजाब क्यों नहीं पहन सकते?’’ गोंजाल्विस ने दलील दी कि अल्पसंख्यक अधिकारों के संदर्भ में संवैधानिक नैतिकता, अल्पसंख्यक की आंखों से किसी मुद्दे को देखने की क्षमता है। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि दुनिया भर में दूसरा सबसे बड़ा धर्म इस्लाम है। उन्होंने कहा कि पूरे देश में, इस्लाम मानने वाले लोग हिजाब को अपने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथा का हिस्सा मानते हैं। एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने शुरुआत में पीठ से कहा कि वह मामले पर दलील देने में थोड़ा अधिक समय लेंगे। उन्होंने कहा, ‘‘यह बहुत गंभीर मामला है। मैं अपनी पूरी क्षमता से आपकी सहायता करना चाहता हूं।’’ दवे ने कहा कि कोर्ट को इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजना चाहिए था।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरा प्रयास आपको (पीठ को) समझाने का है कि इस निर्णय को रद्द करने की आवश्यकता क्यों है। यह मामला पोशाक की तुलना में बहुत गंभीर है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इस मामले में आपके (पीठ) द्वारा बहुत गंभीर ध्यान देने की आवश्यकता है। आप नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संरक्षक हैं।’’ इस मामले में 19 सितंबर को जिरह जारी रहेगी। स्कूल एवं कॉलेज में पोशाक से संबंधित राज्य सरकार के 5 फरवरी, 2022 के आदेश को शीर्ष कोर्ट में भेजा गया था। कर्नाटक हाई कोर्ट के 15 मार्च के फैसले के खिलाफ शीर्ष कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। हाई कोर्ट के फैसले में कहा गया है कि हिजाब पहनना आवश्यक धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है जिसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित किया जा सके।

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