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छोटी सी आशा: बर्थडे सेलिब्रेशन से आया आइडिया, अब तक की 600 गरीबों की मदद

कहा जाता है कि कही कोई आशा हो और उस काम को किया जाए तो वह जरुर पूरा होचा है। और उस काम से जो संतुष्टि और खुशी मिलती है। उसकी बात ही पूरा किए इन दोनों दोस्तों ने।

Shivani Singh @lastshivani
Published : Jan 04, 2016 06:04 pm IST, Updated : Jan 04, 2016 06:13 pm IST
prasant  amit  and sumit
prasant amit and sumit

अगर हमारे पास कोई भी ऐसी सूचना आती है कि ठंड के चलते कोई भी व्‍यक्ति बिना कंबल के रात गुजार रहा है तो हम अपनी सैलरी का कुछ हिस्‍सा ऐसे लोगों पर खर्च करते हैं। हम इसे आशा के बैनर के तहत कर रहे हैं,यह गैरलाभकारी संस्‍था है और फिलहाल इसका रजिस्‍ट्रेशन नहीं हुआ है।

कैसे हुई शुरुआत

प्रशांत ने बताया कि दो साल पहले एक विचार से इसकी शुरुआत हुई जिसके तहत बर्थडे पर होने वाले सेलिब्रेशन,पार्टी पर जितना पैसा आज के समय में हम खर्च करते हैं उतने में ही कई गरीबों की मदद कर सकते हैं जिनको वास्‍तव में ऐसी जरूररत है।

बस इस एक विचार के बाद हम दोनों दोस्‍तों ने अपनी सैलरी के कुछ हिस्‍से और सेविंग की मदद से यह काम शुरु किया। अगर कोई ऑफिस का सदस्‍य या अन्‍य व्‍यक्ति हमारे इस सोच का समर्थन करते हुए योगदान देना चाहता है तो हम उसकी भी मदद लेते हैं। और इस मदद को गरीबों तक पहुंचाते है।

क्या है आशा एनजीओ
आशा एनजीओ स्लम एरिया में रहने वाले लोग जैसे कि मेट्रो स्टेशन, फुटपाथ, रेलवे स्टेशन आदि में जाकर गरीबों को मदद करते है। प्रशांत ने बताया कि इसे मदद को हम अलग तरीके से करते है। हम अपनी खुशी गरीब लोगों के साथ मिल बांट कर मंनाते है। जब हमारा या हमारे किसी दोस्त का बर्थडे या फिर और कोई पार्टी है तो हम लोग स्लम एरिया में जाकर बच्चों और लोगों के साथ मनाते है।

प्रशांत और अमित ने बताया कि आशा एक एनजीओ है। जो कि दो साल पहले शुर हुई थी। इसका नाम प्रशांत की माता आशा में दिया और इसका दूसरा मतलब है कि आशा लोगो से जुडी एक आशा। यह एनजीओ उन सभी के लिए है जो गरीब लोगों की मदद करना चाहते है।

इस समय यह दोनों दोस्त ठंड से परेशान गरीब लोगो को कंबल बांट रहे है। साथ ही यह अपने आशा एनजीओ नाम के फेसबुक पेज में लोगों से यह कपते नजर आ रहे है कि अगर आपको कोई इस ठंड में बिना कंबल या फिर कपड़ो के मिले तो हमें आप इस नंबर में बता दे। हम उनके लिए कंबल और जरुरतों को पूरा करेगे। साथ ही कोई मदद करना चाहता है तो वह भी कर सकता है।

प्रशांत ने बताया कि जब हम कभी कंबल बांटते है तो लोगों की मुस्कारहट तो मिलती है, लेकिन एक कसक रह जाती है कि जब वह लोग कहते है कि बाबूजी आप पहले आ जाते है मेरे चाचा आज जिंदा होते। प्रशांत ने बताया कि हम लोग रात में  वैशाली के एक मॉल के पास कंबल दे रहे थे। तो वहां पर एक व्यक्ति ने कहा कि आप अगर पहले आ गए होते तो मेरे बगल में लेटे एक चाचा जी की मौत ठंड से नही होती। वह आज होते है। जब उस व्यक्ति ने यह बात कही तो हमें समझ नही आया कि हम लोग क्या कहें। वस यहा मन में आया कि काश उन चाचा की हम मदद कर देते यै कोई और कर देता जिससे आज वह किसी को दुआ दे रहे होते।

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