संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान सोमवार को लोकसभा में वंदे मातरम् पर चर्चा का आयोजन रखा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे पर विपक्ष पर जमकर निशाना साधा। वहीं, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी वंदे मातरम् पर चर्चा में भाग लिया और अपनी राय रखी। लोकसभा में राजनाथ सिंह ने कहा कि वंदे मातरम् को वह न्याय नहीं मिला जो इसे मिलना चाहिए था। वंदे मातरम को उसका गौरव लौटाना समय की मांग है। सदन में जब राजनाथ सिंह सदन में अपना भाषण दे रहे थे तब किसी विपक्षी सदस्य ने उन्हें टोकने की कोशिश की। इस घटना पर राजनाथ सिंह ने कड़ी नाराजगी जताई। इस पूरे वाकये का वीडियो भी सामने आया है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह लोकसभा में अपना भाषण दे रहे थे। तभी विपक्ष की ओर से किसी सदस्य ने उन्हें बीच में टोका। इस बात पर राजनाथ सिंह ने कड़ी नाराजगी प्रकट की। उन्होंने नाराज होकर कहा- "कौन बैठाएगा, क्या बात करते हो, चुप रहो?" PTI के मुताबिक, राजनाथ सिंह ने कहा- "संसद में कोई चाहे जो बोले, सच बोले, सत्य से थोड़ा परे भी बोले, लेकिन शोर-शराबा नहीं मचाना चाहिए। बाद में, जब भी बोलने का अवसर मिले, आप प्रतिकार कर सकते हैं। संसद की यह मर्यादा है। सदैव मैंने इसका ध्यान रखा है।"
वंदे मातरम् के साथ नाइंसाफ़ी हुई- राजनाथ सिंह
लोकसभा में वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर बहस के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा- "वंदे मातरम् के साथ जो नाइंसाफ़ी हुई, उसे समझना भी जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां ऐसा करने वालों की सोच और सोच को बेहतर ढंग से समझ सकें। वंदे मातरम् के साथ जो नाइंसाफ़ी हुई, वह कोई अकेली घटना नहीं थी। यह तुष्टिकरण की राजनीति की शुरुआत थी, जिसे कांग्रेस पार्टी ने अपनाया। इसी राजनीति की वजह से देश का बंटवारा हुआ और आज़ादी के बाद सांप्रदायिक सद्भाव और एकता कमज़ोर हुई। आज हम वंदे मातरम् की इज़्ज़त वापस ला रहे हैं, लेकिन कुछ लोग हमारे ख़िलाफ़ यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर सकते हैं कि वंदे मातरम् और जन गण मन के बीच दीवार खड़ी की जा रही है। ऐसा नैरेटिव बनाने की कोशिश बांटने वाली सोच को दिखाती है। हम राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का बराबर सम्मान करते हैं।"
वंदे मातरम् को खंडित किया गया- राजनाथ सिंह
वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर लोकसभा में बहस के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा- "आज, जब हम वंदे मातरम् की डेढ़ शताब्दी की गौरवशाली यात्रा का जश्न मना रहे हैं, तो हमें यह सच स्वीकार करना होगा कि वंदे मातरम् के साथ जो न्याय होना चाहिए था वह न्याय नहीं हुआ। आज, आज़ाद भारत में, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को बराबर दर्जा देने की बात हो रही थी। लेकिन एक हमारी राष्ट्रीय चेतना का अहम हिस्सा बन गया। इसे समाज और संस्कृति की मुख्यधारा में जगह मिली। यह हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों में शामिल हो गया। वह गीत हमारा जन गण मन था। लेकिन दूसरे गीत को किनारे कर दिया गया और नज़रअंदाज़ किया गया। वह गीत वंदे मातरम् है। उसके साथ एक एक्स्ट्रा की तरह व्यवहार किया गया। जिस धरती पर वंदे मातरम् की रचना हुई, उसी धरती पर 1937 में कांग्रेस ने इस गीत को खंडित करने का फैसला किया। सभी पीढ़ियों को वंदे मातरम् के साथ हुए राजनीतिक धोखे और अन्याय के बारे में पता होना चाहिए इसीलिए यह चर्चा हो रही है, क्योंकि यह अन्याय सिर्फ़ एक गीत के साथ नहीं, बल्कि आज़ाद भारत के लोगों के साथ हुआ।"