भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने भारत के सबसे धनी नगर निगम, बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के चुनाव में जीत हासिल की है और अब मेयर बनाने को तैयार दिख रही है। महायुति की बीएमसी में मिली जीत को बड़ी जीत माना जा रहा है क्योंकि साल 2022 तक लगातार कम से कम 25 वर्षों तक ठाकरे परिवार और उनकी पार्टी का कोई सदस्य ही मुंबई की बीएमसी में मेयर बना था। इस परंपरा को पहली बार भाजपा ने तोड़ने का काम किया है। लेकिन भाजपा और शिंदे की शिवसेना ने बीएमसी में जीत तो हासिल कर ली है लेकिन मेयर कौन बनेगा इसे लेकर पेंच फंस सकता है।
शिंदे की शिवसेना बनेगी किंगमेकर
बीएमसी की 227 सीटों में से भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने मिलकर कुल 117 सीटें जीत ली हैं जो बहुमत से तीन सीट ज्यादा है। बीएमसी चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसने 88 वार्डों में जीत हासिल की है। लेकिन तब भी उसके सामने ऐसी कोई स्थिति नहीं है जिसमें भाजपा शिंदे की शिवसेना के समर्थन के बिना मेयर बना सके और नगर निगम पर शासन कर सके। गुणा भाग करें तो समीकरण के तौर पर शिंदे की शिवसेना को किंगमेकर के रूप में देखा जा सकता है।
शिंदे गुट की चाह-मेयर हमारा होना चाहिए
शिंदे गुट के प्रवक्ताओं और अन्य नेताओं ने भी संकेत दिया है कि "मुंबई का महापौर शिवसेना (शिंदे गुट) से होना चाहिए क्योंकि यह बालासाहेब (बाल ठाकरे) की विरासत है।" शिंदे की शिवसेना ने अविभाजित शिवसेना में रहते हुए बीएमसी में लंबे शासन को देखा है। शिंदे, जिन्होंने भाजपा की 132 विधानसभा सीटों के मुकाबले 57 सीटें जीतकर 2024 में भाजपा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनने की असफल कोशिश की थी, इस बार अधिक सतर्क नजर आ रही है। उसने अपने सभी विजयी पार्षदों को फाइव स्टार होटल में शिफ्ट कर दिया है।
भाजपा नेता का बयान-मेयर भाजपा का होगा
शिंदे शिवसेना का कहना है कि कॉरपोरेटर, विधायक और कुछ बड़े नेताओं के साथ शिंदे होटल ताज लैंड्स एंड में महानगरपालिका और आनेवाले जिला परिषद चुनाव पर चर्चा करेंगे। कॉरपोरेटर्स को लंबे समय तक होटल में नहीं रुकाया जाएगा। वहीं, आज सीएम फडणवीस ने फिर से दोहराया और कहा कि एकनाथ शिंदे से बातचीत कर सब तय करेंगे, मेयर महायुति का ही होगा। वहीं, बीजेपी नेता राहुल नार्वेकर ने कहा, मुंबई बीएमसी में मेयर बीजेपी का ही होगा। मुंबई की जनता ने जनादेश ही ऐसा दिया है बीजेपी की सबसे ज़्यादा सीटें चुनकर आई है तो मेयर बीजेपी का होगा।
ऐसे में अगर शिंदे आसानी से भाजपा को महापौर का पद सौंप देते हैं, तो इससे उनके पार्टी कार्यकर्ताओं को गलत संदेश जा सकता है। इसलिए, कम से कम उप महापौर के पद, स्थायी समिति की अध्यक्षता और महत्वपूर्ण वार्डों को लेकर पर्दे के पीछे गहन बातचीत होना लगभग तय है।"