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पूर्व विधायक और उनके परिवार के 7 सदस्यों की हुई थी हत्या, बेटी और दामाद को मिली अंतरिम जमानत

 Published : Dec 11, 2025 11:32 pm IST,  Updated : Dec 11, 2025 11:32 pm IST

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 2001 में पूर्व विधायक रेलू राम पुनिया और उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या के दोषी दंपति सोनिया और संजीव कुमार को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। दोनों ने अपनी समय से पहले रिहाई के लिए हरियाणा सरकार के आदेश को चुनौती दी थी।

Relu Ram Punia murder case, Sonia and Sanjeev Kumar interim bail- India TV Hindi
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सोनिया और संजीव कुमार को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। Image Source : PEXELS REPRESENTATIONAL

चंडीगढ़: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 2001 में 8 लोगों की हत्या के दोषी एक दंपति को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। ये लोग हरियाणा के पूर्व विधायक रेलू राम पुनिया समेत उनके परिवार के सदस्यों की हत्या के मामले में सजा काट रहे थे। कोर्ट ने कहा कि सक्षम अधिकारी उनके समय से पहले रिहाई के फैसले तक इन्हें जमानत पर छोड़ा जाए। यह आदेश सोनिया और उसके पति संजीव कुमार की याचिकाओं पर आया है। उन्होंने हरियाणा सरकार के फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी समय से पहले रिहाई की अर्जी को ठुकरा दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उन्होंने सभी जरूरी शर्तें पूरी कर ली हैं।

क्या है रेलू राम पुनिया हत्याकांड?

घटना 2001 की है, जब 23 अगस्त की रात को हिसार जिले के लितानी गांव में स्थित फार्महाउस पर सोते हुए 50 साल के रेलू राम पुनिया और उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। मारे गए अन्य सदस्यों में पुनिया की 41 वर्षीय पत्नी कृष्णा देवी, 14 वर्षीय बेटी प्रियंका, 23 साल का बेटा सुनील कुमार, 20 वर्षीय बहू शकुंतला देवी, 4 साल का पोता लोकेश, 2 साल की पोती शिवानी और 45 दिन की पोती प्रीति शामिल थीं। सोनिया खुद रेलू राम पुनिया की बेटी है। इस हत्याकांड ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी। रेलू राम पुनिया 1996 में हिसार के बरवाला विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। सोनिया और संजीव कुमार को मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे उम्रकैद में बदल दिया।

कोर्ट ने पहले खारिज कर दी थी अर्जी

जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह ने 21 नवंबर को याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा था और 9 दिसंबर को इसे सुनाया। दंपति ने अपनी अलग-अलग याचिकाओं में अगस्त 2024 के हरियाणा सरकार के आदेश को चुनौती दी थी। उस आदेश में उनकी समय से पहले रिहाई की अर्जी को खारिज कर दिया गया था और कहा गया था कि वे अपनी आखिरी सांस तक जेल में रहेंगे। यह फैसला राज्य स्तरीय समिति की सिफारिश पर अतिरिक्त मुख्य सचिव ने दिया था। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने 2002 की राज्य की समय से पहले रिहाई की नीति के तहत अर्जी दी थी।

कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, 'यह याचिका मंजूर की जाती है और विवादित आदेश को रद्द किया जाता है। प्रतिवादियों/अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ताओं की समय से पहले रिहाई के मामले पर 12 अप्रैल 2002 की नीति के अनुसार और इस फैसले के पिछले पैराग्राफ में की गई टिप्पणियों के मुताबिक विचार करें। यह काम इस आदेश की प्रति मिलने के दो महीने के अंदर किया जाए। सक्षम अधिकारी द्वारा याचिकाकर्ताओं की समय से पहले रिहाई पर फैसला होने तक, याचिकाकर्ताओं को अंतरिम जमानत पर रिहा किया जाए। उन्हें हिसार के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के मुताबिक जरूरी जमानत बॉन्ड जमा करने होंगे।'

कोर्ट ने विवादित आदेश को गलत बताया

कोर्ट ने विवादित आदेश को गलत बताते हुए कहा, 'मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ऊपर चर्चित कानूनी सिद्धांतों की रोशनी में देखा जाए तो पता चलता है कि विवादित आदेश स्पष्ट रूप से विकृत, गैरकानूनी और कानून की नजर में टिकने लायक नहीं है। इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए।' याचिकाओं में कहा गया कि मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने के बाद दोषी 20 साल की वास्तविक सजा और माफी के साथ कुल 25 साल की सजा पूरी करने पर समय से पहले रिहाई के हकदार हैं। सोनिया ने दावा किया कि उन्होंने 21 साल से ज्यादा की वास्तविक सजा काट ली है और माफी के साथ कुल 26 साल और 9 महीने की सजा पूरी हो चुकी है। वहीं, उसके पति संजीव कुमार ने 20 साल से ज्यादा की वास्तविक सजा काटी है और माफी के साथ 25 साल और 9 महीने हो चुके हैं।

'समिति ने अपनी हद से बाहर जाकर टिप्पणियां कीं'

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि विवादित आदेश लागू नीति का उल्लंघन है। उनके वकील ने तर्क दिया कि रिहाई से इनकार करने का एक आधार यह था कि मौत की सजा को उम्रकैद में मेरिट पर नहीं, बल्कि दया याचिका के फैसले में देरी के आधार पर बदला गया। वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद राज्य स्तरीय समिति को इस पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है। यह संदर्भ न सिर्फ अनावश्यक है बल्कि गैरकानूनी भी है। कोर्ट के आदेश में कहा गया कि राज्य स्तरीय समिति ने याचिकाकर्ताओं को आखिरी सांस तक जेल में रखने की सिफारिश करने जैसी टिप्पणियां अपनी हद से बाहर जाकर कीं। (PTI)

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