महाराष्ट्र में 29 नगर निगमों के लिए कल वोट डाले जाएंगे । 3 करोड़ 48 लाख वोटर 16,931 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे। शुक्रवार को वोटों की गिनती होगी। बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना वाली महायुति वृहन्मुम्बई नगर निगम पर पुरानी एकीकृत शिवसेना का 25 साल से चला आ रहा कब्ज़ा खत्म करने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है, जबकि इस बार उद्धव और राज ठाकरे दोनों मिल कर टक्कर दे रहे हैं। 2022 में शिवसेना में विभाजन होने के बाद पहली बार बीएमसी का चुनाव हो रहा है। शिवसेना पिछले 25 साल से इस नगर निगम पर काबिज़ है।
चुनाव नगर निगमों का है, लेकिन कैम्पेन के मुद्दे हिन्दु-मुसलमान से लेकर भारत और पाकिस्तान तक पहुंच गए। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस बाइक पर नागपुर में घूमे, पुणे में अपने ही डिप्टी सीएम अजित पवार की पार्टी के खिलाफ प्रचार किया, अजित पवार ने बीजेपी और एकनाथ शिन्दे की शिवसेना पर भ्रष्टाचार के इल्जाम लगाए, उद्धव ठाकरे ने देवेन्द्र फडणवीस को मराठी विरोधी करार दिया तो नितेश राणे ने उद्धव ठाकरे पर मुसलमानों के वोट के लिए भगवा छोड़कर हरा चोला ओढ़ने का इल्जाम लगा दिया।
बीजेपी के नेताओं ने एकनाथ शिन्दे की पार्टी पर वोटर्स को पैसा बांटने का इल्जाम लगाया। कल्याण डोम्बिवली और अम्बरनाथ में तो बीजेपी और शिन्दे की शिवसेना के कार्यकर्ता आपस मे भिड़ गए, खून खराबा तक हो गया। यानि महाराष्ट्र में महानगर पालिका के चुनाव जीतने के लिए सारे समीकरण टूट गए, सारे गठबंधन बिखर गए।
सवाल ये है कि जो दुश्मनी आज दिख रही है, क्या वो 16 जनवरी को चुनाव नतीजे आने के बाद भी जारी रहेगी? या 16 जनवरी के बाद उद्धव ठाकरे और कांग्रेस फिर साथ साथ दिखेंगे? क्या बीजेपी और शिन्दे की शिवसेना की कड़वाहट दूर हो जाएगी? क्या नगर निगम चुनाव के बाद अजित पवार और शरद पवार साथ साथ आ जाएंगे?
देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि इस बार मुंबई में बदलाव तय है, BMC में महायुति का ही मेयर होगा। पिछले चार साल में सियासी समीकरण बदले हैं। अब उद्धव ठाकरे के हाथ से पार्टी निकल चुकी है, चुनाव निशान भी चला गया है और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी का एक ही गढ़ मुंबई बचा है। इसलिए बीजेपी BMC पर कब्जे की पूरी कोशिश कर रही है। उद्धव को सबसे ज्यादा टेंशन BMC को लेकर है। प्रचार के आखिरी दिन उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे मुंबई की सड़कों पर पैदल घूमे, घर-घर जाकर वोट मांगे। उद्धव ठाकरे अंधेरी के संघर्ष नगर इलाके में गए, वोटर्स से मिले।
महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों में इस बार कमाल का नज़ारा देखने को मिला। न किसी ने विचारधारा की परवाह की, न गठबंधन की। न दोस्ती काम आई, न दुश्मनी। देवेंद्र फडणवीस ने इन चुनावों में जान लगा दी। उद्धव और राज ठाकरे के लिए ये अस्तित्व का सवाल बन गया। ये दोनों इस बार BMC चुनाव हार गए तो कहीं के नहीं रहेंगे। इस चुनाव में बालासाहेब ठाकरे की विरासत का भी इम्तिहान होगा। BMC का रिमोट हमेशा बालासाहेब के हाथ में रहा।
इस बार चुनाव जीतने के लिए न आरोपों की मर्यादा रखी गई, न भाषा की। किसी ने कहा कि बीजेपी वाले मुंबई को महाराष्ट्र से अलग कर देंगे, किसी ने कहा कि ठाकरे मुसलमान को मेयर बना देंगे। ठाकरे ने कहा कि बीजेपी आई तो हिंदू को मेयर बनाएंगे, मराठी को नहीं। सबसे बड़ी बात है कि चुनाव लड़ते समय गठबंधन का साथी चुनने में सिद्धांतों को ताक पर रख दिया गया। मुझे लगता है कि महाराष्ट्र में राजनीति का ये ट्रेंड काफी दिनों तक दिखाई देगा। (रजत शर्मा)
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