लंदन: ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अफगानिस्तान युद्ध के दौरान NATO देशों की सेनाओं पर घिनौनी और अपमानजनक टिप्पणी के लिए माफी मांगने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ट्रंप का नाटो सेनाओं के फ्रंटलाइन से दूर रहने का दावा झूठा है। इसके लिए उनको माफी मांगनी चाहिए। बता दें कि ट्रंप ने गुरुवार को स्विट्जरलैंड के दावोस में फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वे निश्चित नहीं हैं कि NATO अमेरिका की मदद के लिए आगे आएगा, यदि कभी जरूरत पड़ी। उन्होंने कहा, “हमे कभी उन्हें जरूरत नहीं पड़ी, हमने कभी उनसे कुछ नहीं मांगा। वे कहते हैं कि उन्होंने अफगानिस्तान में कुछ सैनिक भेजे, या यह-वह किया, और उन्होंने किया भी, लेकिन वे थोड़ा पीछे रहे, फ्रंटलाइन से थोड़ा दूर रहे।”
ट्रंप की टिप्पणी ने मचाया बवाल
ट्रंप की यह टिप्पणी ब्रिटेन में भारी आक्रोश और दुख का कारण बनी है। स्टार्मर ने ब्रिटिश सेना के उन 457 सैनिकों को श्रद्धांजलि दी जो अफगानिस्तान में शहीद हुए। उन्होंने कहा, “मैं उनकी बहादुरी, साहस और देश के लिए किए गए बलिदान को कभी नहीं भूलूंगा। मैं राष्ट्रपति ट्रंप की टिप्पणियों को अपमानजनक और स्पष्ट रूप से घिनौनी मानता हूं। मुझे आश्चर्य नहीं है कि इससे शहीदों के परिजनों और पूरे देश में इतना दर्द हुआ है।” स्टार्मर ने कहा कि यदि उन्होंने ऐसी बात कही होती, तो वे जरूर माफी मांगते। उन्होंने डायने डर्नी (जिनके बेटे बेन पार्किंसन 2006 में अफगानिस्तान में लैंडमाइन विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हुए थे) की अपील पर कहा कि उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है और ट्रंप को ऐसी बातों के लिए माफी मांगनी चाहिए।
ब्रिटेन ने 9/11 पर भी दिया था अमेरिका का साथ
उन्होंने कहा कि ब्रिटेन का बलिदान 9/11 हमलों के बाद भी अमेरिका के लिए था। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा था कि ब्रिटेन अमेरिका के साथ “कंधे से कंधा मिलाकर” खड़ा रहेगा। ब्रिटिश सेना ने अफगानिस्तान में कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में प्रमुख भूमिका निभाई, खासकर हेलमंद प्रांत में सक्रिय रही। 2014 में ब्रिटिश सेना वापस लौटी, जबकि अमेरिकी सेना 2021 में अराजक तरीके से वापस गई, जिसके बाद तालिबान सत्ता में लौट आया। 2001 के अमेरिका-नेतृत्व वाले आक्रमण के बाद 1.5 लाख से अधिक ब्रिटिश सैनिकों ने अफगानिस्तान में सेवा की, जो अमेरिकी सेना के बाद सबसे बड़ी संख्या थी। बेन ओबेज-जेक्टी (रॉयल यॉर्कशायर रेजिमेंट के पूर्व कैप्टन, जो अफगानिस्तान में तैनात थे) ने कहा कि राष्ट्रपति द्वारा हमारे राष्ट्र के बलिदान और NATO सहयोगियों को इतना सस्ता आंकना दुखद है।
ट्रंप को याद दिलाया वियतनाम युद्ध
स्टार्मर ने कहा कि ट्रंप की टिप्पणी पर और गुस्सा इसलिए बढ़ा क्योंकि वे खुद वियतनाम युद्ध में सेवा से बच गए थे। वे बोन स्पर्स के कारण ड्राफ्ट से छूट पाए, लेकिन वे याद नहीं कर पाते कि किस पैर में समस्या थी, जिससे ड्राफ्ट डॉजिंग के आरोप लगे। लेखक स्टीफन स्टीवर्ट ने कहा कि वियतनाम से बचने वाले व्यक्ति द्वारा ऐसी शर्मनाक टिप्पणी करना बेहद विडंबनापूर्ण है।
ट्रंप NATO पर कर रहे बार-बार हमले
यह ट्रंप की हालिया टिप्पणियों में से एक है, जिसमें उन्होंने NATO सहयोगियों की प्रतिबद्धता को कम करके आंका। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने ग्रीनलैंड (डेनमार्क का सेमी-ऑटोनॉमस क्षेत्र) पर कब्जे की धमकी दी और यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की बात कही, जो NATO के भविष्य पर सवाल उठाती है। वास्तविकता में, NATO के आर्टिकल 5 (म्यूचुअल डिफेंस क्लॉज) का इस्तेमाल 9/11 हमलों के बाद अमेरिका की मदद के लिए केवल एक बार हुआ । सभी सदस्य देशों ने सहायता की। डेनमार्क जैसे देशों ने प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा बलिदान दिया और उसके 44 सैनिक शहीद हुए। पूर्व डेनिश प्लाटून कमांडर मार्टिन तम्म एंडरसन ने कहा, “जब अमेरिका को 9/11 के बाद हमारी जरूरत थी, हम वहां थे।”
ब्रिटेन में ट्रंप के खिलाफ भारी गुस्सा
ट्रंप की यह टिप्पणी ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को और खराब कर सकती है। ग्रीनलैंड पर NATO महासचिव मार्क रूट से मुलाकात के बाद ट्रंप ने पीछे हटकर “आर्कटिक सिक्योरिटी” पर फ्रेमवर्क बनाने की बात कही, लेकिन संबंधों पर असर पड़ा है। ट्रंप की ये टिप्पणियां NATO के प्रति उनके पुराने संदेह को दर्शाती हैं, लेकिन सहयोगी देशों के लिए यह अपमानजनक हैं। ब्रिटेन में राजनीतिक पार्टियां एकजुट होकर ट्रंप की निंदा कर रही हैं, और स्टार्मर पर दबाव है कि वे ट्रंप से सीधे मुकाबला करें।
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