Thursday, January 15, 2026
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एक्सपर्ट से जानें ग्लूकोमा की चपेट में किस उम्र के लोग तेजी से आते हैं? और बचाव के लिए क्या करना चाहिए?

ग्लूकोमा चुपचाप असर करता है, लेकिन इसका असर जीवनभर रह सकता है। इसलिए आँखों की नियमित और संपूर्ण जाँच को नजरअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।

Written By: Poonam Yadav @R154Poonam
Published : Jan 15, 2026 10:33 pm IST, Updated : Jan 15, 2026 10:36 pm IST
ग्लूकोमा - India TV Hindi
Image Source : FREEPIK ग्लूकोमा

अक्सर लोग आँखों की बीमारी को तब गंभीरता से लेते हैं, जब दिखना कम होने लगे। लेकिन ग्लूकोमा एक ऐसी बीमारी है जो बिना दर्द और बिना शुरुआती संकेतों के धीरे-धीरे आँखों की रोशनी को नुकसान पहुँचाती है। इसी कारण इसे “साइलेंट ब्लाइंडनेस” कहा जाता है। रेटिना स्पेशलिस्ट, कंसल्टेंट ऑप्थल्मोलॉजिस्ट और विट्रियो, डॉ. राहुल भाटिया कहते हैं कि ग्लूकोमा में आँखों के अंदर बनने वाला दबाव सामान्य से अधिक हो जाता है। यह बढ़ा हुआ दबाव आँख की सबसे अहम नस ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचाता है। शुरुआत में मरीज को कोई परेशानी महसूस नहीं होती, लेकिन समय के साथ देखने का दायरा धीरे-धीरे सिमटने लगता है। समय पर इलाज न हो, तो यह स्थायी अंधेपन का कारण बन सकता है। चलिए जानते हैं ग्लूकोमा की चपेट में किस उम्र के लोग तेजी से आते हैं और बचाव के लिए क्या करना चाहिए?

कौन लोग ज़्यादा जोखिम में हैं?

 

40 वर्ष की उम्र के बाद ग्लूकोमा का खतरा बढ़ जाता है। जिन लोगों के परिवार में ग्लूकोमा रहा हो, जिन्हें लंबे समय से शुगर या ब्लड प्रेशर की समस्या हो, आँखों में कभी चोट लगी हो या बिना डॉक्टर की सलाह के स्टेरॉइड दवाइयों का इस्तेमाल किया गया हो उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। 

समय पर जाँच क्यों ज़रूरी है?

ग्लूकोमा का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि शुरुआती दौर में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। सामान्य जाँच से इसका पता नहीं चलता। इसके लिए आँखों के दबाव की जाँच, ऑप्टिक नर्व की जाँच और ज़रूरत पड़ने पर विशेष टेस्ट किए जाते हैं। 40 साल की उम्र के बाद हर व्यक्ति को नियमित रूप से पूरी आँखों की जाँच करानी चाहिए, भले ही कोई शिकायत न हो।

बचाव और नियंत्रण कैसे संभव है?

ग्लूकोमा से जो रोशनी एक बार चली जाती है, उसे वापस नहीं लाया जा सकता। लेकिन अगर बीमारी समय पर पकड़ में आ जाए, तो आगे होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है। इसके लिए आई ड्रॉप्स, लेज़र या सर्जरी का सहारा लिया जाता है।

आजकल कई लोग दर्द, एलर्जी या त्वचा की समस्याओं के लिए स्टेरॉइड दवाइयाँ या ड्रॉप्स अपने-आप इस्तेमाल करने लगते हैं, जो आँखों के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है। स्टेरॉइड किसी भी रूप में चाहे गोली, क्रीम, इनहेलर या आई ड्रॉप, बिना पंजीकृत डॉक्टर की सलाह के नहीं लेना चाहिए। दुर्लभ मामलों में यह बीमारी बच्चों और युवाओं में भी पाई जा सकती है।

एक बहुत ज़रूरी बात यह है कि ग्लूकोमा का इलाज शुरू होने के बाद दवाइयाँ अपने-आप बंद नहीं करनी चाहिए। कई बार मरीज बेहतर महसूस होने पर ड्रॉप्स छोड़ देते हैं, जो आँखों को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। इलाज में कोई भी बदलाव केवल प्रशिक्षित नेत्र रोग विशेषज्ञ की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।)

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