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Rajat Sharma Blog: समलैंगिक संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक स्वागतयोग्य कदम

 Published : Sep 07, 2018 06:47 pm IST,  Updated : Sep 07, 2018 06:49 pm IST

सुप्रीम कोर्ट ने ठीक कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है और समाजिक नैतिकता किसी भी एक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती।

Rajat Sharma Blog: Supreme Court verdict decriminalizing gay sex is a welcome step - India TV Hindi
Rajat Sharma Blog: Supreme Court verdict decriminalizing gay sex is a welcome step  Image Source : INDIA TV

सुप्रीम कोर्ट की ​पांच जजों की बेंच ने गुरुवार को सर्वसम्मति से दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिक वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंधों को वैध करार दिया जिसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत अबतक अपराध माना जाता था। वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने समलैंगिक संबंधों को अपराध करार दिया था, लेकिन गुरुवार को पांच जजों की बैंच ने 2013 के फैसले को 'मनमाना, गलत और प्रतिगामी' बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा, ' एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीयर) के सदस्यों और उनके परिजनों पर जो ज़्यादतियां हुई है, उसके लिए इतिहास हमसे माफी की अपेक्षा करता है ।

होमो सेक्सुअलिटी, गे, सेम सेक्स और लेस्बियन कुछ भी नाम दें, यह बीमारी नहीं है। इसे एक जेनेटिक फ्ला (अनुवांशिकी दोष) कह सकते हैं या इसे हॉर्मोनल डिसऑर्डर ( हॉरमोन दोष )माना जा सकता है। जो समलैंगिक हैं, वे  आम लोगों से अलग ज़रूर हैं, लेकिन इसके लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता, न ही किसी से इसको लेकर नफरत करनी चाहिए। इसके लिए न किसी से नाराज होना चाहिए और न किसी की हंसी उड़ानी चाहिए। आज के आधुनिक समाज में आप किसी भी समलैंगिक को अपनी यौन इच्छा छिपा कर रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। 

सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा है कि समलैंगिकता अपराध नहीं है और सामाजिक नैतिकता किसी भी एक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकती। जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन ने कहा, 'जो लोग समलैंगिक हैं उन्हें पूरे सम्मान के साथ जीने का हक है.. हम यहां आगे यह कहना चाहते हैं कि ऐसे समूह (एलजीबीटीक्यू) समान कानूनों की सुरक्षा के हकदार हैं और समाज में बिना किसी कलंक के समान  व्यवहार के हकदार हैं।' 

लेकिन ये कहना जितना आसान है उसे हमारे समाज में लागू करना उतना ही मुश्किल है। हमारे समाज में समलैंगिकता को लेकर कुछ पूर्वाग्रही विचार या धारणाएं बनी हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बलपूर्वक लागू करने में कठिनाई हो सकती है। सिर्फ कानून बनाकर, डंडा चलाकर, समाज की मानसिकता को नहीं बदला जा सकता। इस तरह के संबंधों को समाज समझे, उनको स्वीकार करे, इसके लिए थोड़ा वक्त देना पड़ेगा। जस्टिस नरीमन ने ठीक कहा कि इसका प्रचार-प्रसार करना होगा।

साथ ही समलैंगिकों को इस बात का अहसास होना चाहिए कि हमारा समाज इस समय सार्वजनिक स्थानों पर यौन इच्छाओं के दिखावे की इजाजत नहीं देता। इसलिए उन्हें बहुत धैर्य और संयम से काम लेना होगा। सबसे अहम बात यह है कि समलैंगिकों को इस बात का ख्याल रखना पड़ेगा कि उनका व्यक्तिगत रिश्ता उनका निजी मामला है। लेकिन ये चारदीवारी के अंदर हो, इसका उन्हें ध्यान रखना पड़ेगा। क्योंकि सार्वजनिक तौर पर अश्लीलता कानून की नजर में अभी भी गुनाह है। (रजत शर्मा)

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